प्रेम :-एक वैचारिक लेख
प्रेम :-एक वैचारिक लेख आज के युवा वर्ग में एक गलत धारणा बन गई है ,जो साहित्य के सबसे पवित्र शब्द "प्रेम " को धूमिल कर उसकी सही परिभाषा को बदल दी है। जी हाँ ,सिर्फ युवा वर्ग ही नहीं ,बल्कि ये गलत धारणा हमारे समाज के किशोर - किशोरियों से लेकर प्रौढ़ावस्था में भी एक लाइलाज बीमारी के रूप में बहुत तेजी से फ़ैल रही है। गाँव की धूलभरी गलियों से लेकर शहर के कस्वों तक ,माध्यमिक विद्यालयों से लेकर विश्विद्यालयों तक ,ईंट की छोटी -सी भट्टी से लेकर बड़े -बड़े कलकारखानों में काम करने वाले किशोर ,युवा तथा प्रौढ़ अपने विपरीत लिंग से प्रेम करने लगे हैं। पाठकगण शायद आप खुश हो रहे होगें। आप सोच रहे होगें,"वाह,अब तो समाज में ईर्ष्या ,घृणा ,क्रोध का तो नामोनिशान नहीं रहा होगा। " लेकिन ऐसी बात नहीं है,जिस अनुपात में समाज में प्रेम करने वाले बढ़े हैं ,उसी अनुपात में ईर्ष्या ,घृणा ,क्रोध ,हत्या ,धोखा ,नफरत ,बलात्कार ,अपराध भी बढ़ते जा रहे हैं. जरा सोचिये ,गंभीरतापूर्वक सोचिये क्या है ये सब !कोई लड़की कहती है ,"प्रेम करना पुण्य है ,नफरत करना पाप ! वही लड़की अपनी प्रेमी से कहती है ,"तुम ...

nice thought
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